प्रकृति के उपचार का नियम!

प्रकृति के उपचार का नियम क्या है?

प्रकृति के उपचार का नियम है, “एक समान और मजबूत बीमारी एक समान और कमजोर बीमारी को खत्म करती है। “सिमिलिया सिमिलिबस क्युरेंचर”, “समः समं शमयति” अर्थात समान ही समान का शमन करता है अर्थात जैसे को तैसा।

कैसे?

प्रकृति के उपचार का नियम

सीधे मुद्दे पर आने से पहले, आइए इतिहास की एक संक्षिप्त यात्रा करें।

जब मास्टर हैनिमैन ने एलोपैथिक अभ्यास छोड़ दिया, तो इससे पूरी तरह से असंतुष्ट होने के बाद, उन्होंने अपने रोजी-रोटी के लिए चिकित्सा शास्त्रों का अनुवाद करना शुरू कर दिया।

१७९० में, जब हैनीमैन कलन की मटेरिया मेडिका का अंग्रेजी से जर्मन में अनुवाद करने में लगे हुए थे, तो वे लेखक की इस टिप्पणी से असंतुष्ट हो गए कि, कुनैन की छाल मलेरिया को उसके कड़वे स्वाद के कारण ठीक करती है। उन्होंने सोचा कि कई अन्य पदार्थों में भी कड़वा स्वाद होता है और हर कड़वी चीज का एक जैसा प्रभाव नहीं हो सकता है। उनका तार्किक और वैज्ञानिक दिमाग इसे स्वीकार नहीं कर सका।

सत्यापन के उद्देश्य से, हैनीमैन ने स्वयं कुछ दिनों के लिए दिन में दो बार 4 ड्रम कुनैन की छाल के रस का सेवन किया। आश्चर्यजनक रूप से, उस पर एग्यू या मलेरिया ज्वर के समान लक्षणों का हमला हुआ!

उन्होंने अन्य दवाओं के साथ अपने और अन्य स्वस्थ व्यक्तियों पर इसी तरह के प्रयोग किए।

निष्कर्ष के रूप में उन्होंने पाया कि, एक दवा एक बीमारी का इलाज कर सकती है, क्योंकि यह स्वस्थ व्यक्तियों में एक समान बीमारी पैदा कर सकती है।

इस खोज से सदृश का नियम स्थापित हुआ।

“सिमिलिया सिमिलिबस क्युरेंचर”…

“समः समम शमयति” …

इस प्रकार प्रकृति के इलाज का नियम, “सिमिलिया सिमिलिबस क्युरेंचर”, जिसका अर्थ है समान ही समान का उपचार करता है, खोजा गया।

संपूर्ण होम्योपैथी प्रकृति के इस नियम से निकली है।

बाद में उन्होंने पाया कि दवा बीमारी से थोड़ी मजबूत होनी चाहिए। इसलिए शक्तिकरण या दिव्यकरण के तरीकों का आविष्कार किया गया।

तो प्रकृति का इलाज का नियम है, “एक समान और मजबूत बीमारी एक समान और कमजोर बीमारी को बाहर करती है”।

होम्योपैथी के सभी ७ प्रमुख सिद्धांत प्राकृतिक उपचार के इस नियम पर आधारित हैं।

प्रकृति अपने नियम कभी नहीं बदलती।

वे सार्वभौम सत्य हैं। जैसे कि गति के नियम, गुरुत्वाकर्षण के नियम, समय के साथ नहीं बदले जा सकते हैं, इसलिए प्रकृति के इलाज के नियम को बदला नहीं जा सकता है और यह हर समय प्रभावी रहेगा।

प्रकृति के नियमों का पालन किए बिना कोई भी सच्ची सफलता प्राप्त नहीं कर सकता है।

प्रकृति के इलाज के नियम का पालन किए बिना कोई भी सही उपचार हासिल नहीं कर सकता…

Like vs Need! Business vs Treatment!

Let’s Discuss Like vs Need! Business vs Treatment!

Doing what people like is business.

Doing what people need is treatment.

People don’t need, what they like.

People don’t like, what they need.

Why? Because often they do not know what they need. Most people blindly imitate instead of thinking for themselves, without observing the consequences.

Instead of looking at the difference between short-term and long-term consequences, common people feel comfortable following some other blind wisdom.

Blind Wisdom

Often the bourgeoisie, to fulfil their maladaptive aspirations, keeps them deceived.

We know that the whole propaganda machinery is under the control of the capitalists, most of whom can stoop to any extent for their petty selfishness or out of ignorance.

So let’s get back to the original topic…

After all, what do people need and what do they like?

The struggle is needed and escape is liked.

For example, you must have heard the story of the caterpillar and the butterfly, in which a student, upon seeing the inexplicable struggle of the caterpillar, took pity and helped the caterpillar by tearing the membrane, and the caterpillar died on its way out. The professor who had gone out after instructing the students to look only and not to touch the caterpillar, on his return, explained to the ashamed student that, you did not take pity on him but, killed him. You took away its struggle which was necessary for the development of its lungs, wings and other organs. The same struggle was going to give it the “strength” to live in the outside world.

“Struggle gives strength”, even if it is the power to fight diseases.
Like vs Need

Similarly, when someone has a fever or other acute diseases, which are often temporary, we see signs of struggle. Generally, these symptoms go away on their own in a few hours or days, without medication, with certain precautions, and immunity is developed, which protects against many chronic diseases to come.

But what happens?

People do palliative management, which may be liked temporarily, but later very dislikable results come.

After suppressing the diseases, when it is not possible to suppress them further, one has to return to the “curative treatment”.

By then it is too late and it is natural to take time to clear the suppressed diseases one by one.

But what happens is that the patient’s patience has run out and his body, mind and wealth have become weak.

Burnout and Exhausion

Above that, the struggle from which he has become habituated to running away, he has to go through it continuously.

This situation is very challenging for the homoeopath. It is difficult to understand the truth, it is even more difficult to explain the truth.

The condition of the patient is also such that, he keeps “unreasonable expectations”, which is the only cause of all the miseries of the world.

The conclusion is that the therapy that people like is palliative management and what people need is curative treatment.

It is better if the need is recognized in time, then it will turn into a choice. Remember, The right path is the one on which one has to return”.

Problem Vs Opportunity. Every opportunity is a problem and every problem is an opportunity!

What looks does not happen and what happens does not look. Let’s see Problem vs opportunity.

Problem Vs Opportunity

Often what is an opportunity, people understand it as a problem. Because opportunity always comes in disguise. That’s why it appears as a problem.

Let us try to understand this in detail in the present situation.

Nowadays every person is repeating the same thing repeatedly: Corona, Corona, Corona!

First of all, let us decide here, Is Corona our friend or enemy?

As far as I am concerned, Corona is also an enemy or maybe. Or even a friend or maybe. This will depend on the host, i.e. in whose body the infection has occurred.

Even if we use common sense without going into depth, then why does not every person have the same effect in any epidemic or any infection?

The simple answer will be, immunity! And if you think a little deeper, then the life force is also called Vital Force or Vital Principle.

So now the question arises, How will this immunity increase or balance? Becoming independent or becoming dependent?

Self-reliant or dependent? What would you like to be?

No matter how many arrangements are made outside, it is almost impossible to prevent infection.
Need to be strong from the inside.

Forcibly lowering the temperature in fever, feeding paracetamol after vaccination, always keeping children decorated in slippers-shoes and clothes since childhood and not letting them come in contact with nature and whenever the body is taking out any disease, suppression in the name of modern medicine, etc., reduces immunity.

To snatch someone’s struggle is to deprive him of strength.

Seasonal ailments like cold, cough, and fever, “boost” not only immunity but also vitality, along with cleaning the body. Infections by viruses, bacteria, etc. assist in this process. So, what is considered a problem is an opportunity!

Remember, not all people die in epidemics, only those who are weak inside die.

Struggle gives strength, escape will only lead to weakness.

That is why our system of medicine should be such that there is no unnecessary outside help or interference. The person should be made self-reliant, not dependent.

This is what is done in homoeopathy. The patient is brought back to a normal state of health, where he does not need any external help repeatedly.

होमियोपैथी चिकित्सा से पहले यह समझना जरूरी है।

अक्सर लोग पूछते हैं कि होमियोपैथी में फलाना रोग की कौन सी दवा है? या फिर यह पूछते हैं कि फलाना रोग का इलाज होमियोपैथी में है या नहीं?

यह समझ लेना चाहिए कि अक्सर जिसे रोग कहा जाता है, वह केवल एक लक्षण या किसी एक अंग से संबंधित लक्षण होते हैं, जबकि रोग का कारण रोगी की जीवनी शक्ति में अव्यवस्था होती है।

होम्योपैथी में किसी भी रोग की कोई भी दवा फिक्स्ड नहीं है।

होम्योपैथी में रोग की दवा खोजने वाले हमेशा असफल रहते हैं। जो रोगी की दवा खोजते हैं, वही सफल होते हैं।

रोग का इलाज करना रोग को दबाना है और आज अधिकांश होमियोपैथ भी यही कर रहे हैं।

इसीलिए एक ही रोग से ग्रसित अलग अलग रोगियों की दवा अलग अलग हो सकती है तथा एक ही दवा अलग अलग रोगों में दी जा सकती है।

अर्थात रोग नहीं रोगी की चिकित्सा की जाती है।

यह निर्भर करता है रोगी के सम्पूर्ण लक्षणों, इतिहास, शारीरिक एवं मानसिक संरचना, सामाजिक एवं आर्थिक स्थिति, घरेलू वातावरण, इत्यादि के गहन अध्ययन एवं विश्लेषण पर।

होमियोपैथी में किसी एक रोग की चिकित्सा नहीं की जाती, बल्कि रोगी की सम्पूर्ण चिकित्सा की जाती है।

अर्थात, हर रोग की चिकित्सा है होमियोपैथी में।

अगर रोगी ने होमियोपैथी चिकित्सा लेने में बहुत ही ज्यादा देर कर दी है और उसकी जीवनी शक्ति बहुत ही ज्यादा कमजोर हो चुकी है, तब रोगों को बाहर निकालना संभव नहीं होता।

यह चिकित्सा रोगी के सारे दबे हुए रोगों को बाहर निकालती है, बारी बारी से…

अतः होमियोपैथी से स्थायी समाधान की जगह अस्थायी रोकथाम की अपेक्षा अनुचित है, जो निराशा का कारण ही बनेगी।

इसीलिए होमियोपैथी चिकित्सा प्रारंभ करने के बाद कोई भी अन्य दवा न खानी चाहिए न लगानी चाहिए।

चाहे वो कोई भी अन्य समस्या क्यों न हो, जबतक कि आपका चिकित्सक स्वयं यह सलाह नहीं दे।

अन्यथा रोग जटिल हो जाता है।

कोई भी रोग जैसे कि बुखार, सर्दी, चर्मरोग इत्यादि अंदर से बाहर निकलने पर खुश होना चाहिए और उसे वापस दबाने वाली चिकित्सा नहीं लेनी चाहिए।

हर मौका एक समस्या है और हर समस्या एक मौका!

जो दिखता है वह होता नहीं और जो होता है वह दिखता नहीं।

अक्सर जो होता है मौका, उसे लोग समझ लेते हैं समस्या। क्योंकि मौका हमेशा पहले भेष बदलकर ही आता है। अर्थात समस्या के रूप में ही वह नजर आता है।

आइए वर्तमान परिस्थिति में हम इस बात को विस्तार से समझने का प्रयास करें।

जैसे अभी हर आदमी एक ही बात बार-बार दोहरा रहा है कोरोना, कोरोना, कोरोना।

पहले तो हम यहां फैसला कर ले कोरोना हमारा मित्र है या शत्रु है?

जहां तक मेरा विचार है कोरोना शत्रु भी है या हो सकता है। अथवा मित्र भी है या हो सकता है। यह निर्भर करेगा होस्ट पर, अर्थात जिसके शरीर में संक्रमण हुआ है।

बिना गहराई में गये भी अगर कॉमन सेंस का इस्तेमाल करें तो, किसी भी महामारी में या किसी भी संक्रमण से सभी व्यक्ति पर एक जैसा असर क्यों नहीं पड़ता?

सीधा सा जवाब मिलेगा, इम्युनिटी! अर्थात, रोग-प्रतिरोधक क्षमता या शक्ति। और थोडी गहराई से विचार करें तो जीवनी शक्ति जिसे वाइटल फ़ोर्स या वाइटल प्रिंसिपल भी कहा गया है।

तो अब प्रश्न उठता है कि, यह रोग-प्रतिरोधकता कैसे बढ़ेगी या सन्तुलित होगी? आत्मनिर्भर बनने से या पराश्रित बनने से?

आत्मनिर्भर या पराश्रित? आप क्या बनना चाहेंगे?

बाहर बाहर कितनी भी व्यवस्था कर लें, संक्रमण को रोकना लगभग असंभव होता है।
जरूरत है अंदर से सबल होने की।

बुखार में जबरदस्ती तापमान को कम करना, टीकाकरण के बाद पेरासिटामोल खिलाना, बचपन से ही हमेशा चप्पल-जूते और कपड़ों में बच्चों को सजा-धजा कर रखना और प्रकृति के संपर्क में नहीं आने देना तथा जब भी शरीर कोई रोग बाहर निकाल रहा हो उसे आधुनिक चिकित्सा के नाम पर दबा देना, इत्यादि रोग-प्रतिरोधकता (इम्युनिटी) को कम कर देते हैं।

किसी का संघर्ष छीनना, उसे शक्ति से वंचित कर देना है।

दरअसल सर्दी-खांसी, बुखार जैसे मौसमी उपसर्ग शरीर की सफाई करने के साथ-साथ इम्यूनिटी ही नहीं वाइटैलिटी को भी “बूस्ट’ करते हैं और वायरस, बैक्टीरिया इत्यादि के संक्रमण इस प्रक्रिया में सहायता करते हैं, अतः जिसे समस्या समझा जाता है, वही मौका होता है!

याद रखिये, महामारियों में सभी लोग नहीं मर जाते, केवल वही मरते हैं, जो अंदर से कमजोर होते हैं।

संघर्ष से ही शक्ति मिलती है, पलायन से तो दुर्बलता ही प्राप्त होगी!

इसीलिए हमारी चिकित्सापद्धति ऐसी होनी चाहिए, जिसमें अनावश्यक बाहरी मदद या हस्तक्षेप नहीं हो। व्यक्ति को आत्मनिर्भर बनाया जाय, न कि पराश्रित।

होमियोपैथी में यही किया जाता है। रोगी को स्वास्थ्य की सामान्य अवस्था में वापस लाया जाता है, जहां उसे किसी भी बाहरी मदद की बार-बार आवश्यकता ही नहीं पड़ती।

Nature’s Law of Cure! Is It Important for You to Know This in the 21st Century?

What is nature’s law of cure? Nature’s law of cure is, “a similar and stronger disease eliminates a similar and weaker disease”. “Similia Similibus Curantur”, which means similar cures similar or like cures like. so, let’s discuss what is the homoeopathic law of nature?

Nature's Law of Cure

How Nature’s Law of Cure was Discovered?

Before coming directly to the point, let’s take a brief tour of the history.

When Master Hahnemann left his Allopathic practice, after being completely dissatisfied by it, he began translating medical scriptures, for his butter and bread.

In 1790, when Hahnemann was engaged in translating Cullen’s Materia Medica from English to German, he became dissatisfied by the remark of the author that, cinchona bark cures malaria due to its bitter taste.

He thought that several other substances also have a bitter taste and every bitter thing can’t have the same effect. His logical and scientific mind couldn’t accept it.

For the purpose of verification, Hahnemann himself ingested 4 drams of cinchona juice twice daily for few a days.

Amazingly, he was attacked by symptoms very similar to ague or malarial fever.

He conducted similar experiments on himself and other healthy individuals with other medicines.

In conclusion, he found that a medicine can cure a disease, because it can produce a similar disease, in healthy individuals.

By this discovery, the law of similia was established.
“Similia Similibus Curantur”…

Thus nature’s law of cure is, “Similia Similibus Curantur”, which means “similar cures similar” or “like cures like” became discovered.

The whole of Homoeopathy derives from this law of nature.

Later he found that the medicine should be slightly stronger than the disease. Hence the methods of potentisation or dynamization were invented.

So nature’s law of cure is, “a similar and stronger disease eliminates a similar and weaker disease”.

All of the 7 Cardinal Principles of Homoeopathy are based upon this law of natural cure.
Nature never changes its laws.

They are universal truths. As laws of motion, the law of gravitation can’t be changed over time, so nature’s law of cure can’t be changed and will remain effective all the time.

Law of Nature

Without following the laws of nature, no one can achieve true success.
Without following nature’s law of cure, no one can achieve a true cure…

Homeopathy: What? Why? How? When?

What is Homeopathy? Why Homeopathy? How Homeopathy? When Homeopathy?

Homoeopathy! Popularly written as Homeopathy has vast scopes of learning, discussion, research and confusion also. The fact is that most of the practitioners of Homeopathy don’t understand it themselves and hence propagate myths instead of facts towards the masses people.

Here we are going to discuss in brief what, why, how and when about Homeopathy. A detailed post upon each and every topic will be published separately.

What is Homeopathy?
Based upon Nature’s Law of Cure, Homeopathy is a way of treatment to achieve Ideal Cure, in which shifting of the diseases occurs from the more vital organ(s) to less vital organ(s) according to 3 laws of model cure.

Why Homeopathy?
To restore the sick to health, to cure, as it is termed.

Restore is a term indicating that something has been altered, something has deviated from its normal state, which needs to be moved in the reverse direction.

Sick is a term indicating the patient as a whole, the person who needs the treatment, not mare parts of his body affected.

Health is a term indicating the normal state of well-being, physically, mentally and spiritually too.

Read more…

How Homeopathy?
By following all of the 7 Cardinal Principles of Homeopathy, which is merely followed by very few physicians.

When Homeopathy?
Whenever a person becomes sick, except where the vitality is too weak to react. Even many so-called surgical cases can be treated with medicine, with or without surgery.

व्यापार या उपचार? पसंद या जरुरत?

आप किसे चुनेंगे? पसंद या जरुरत? व्यापार या उपचार?

पसंद है लोगों की जो, वो करना व्यापार है। जरुरत है लोगों की जो, वो करना उपचार है।।

पसंद है लोगों की जो, वो उनकी जरुरत नहीं। जरुरत है लोगों की जो, वो उनकी पसंद नहीं।

क्यों? क्योंकि अक्सर उन्हें पता ही नहीं होता कि, उनकी जरुरत क्या है। ज्यादातर लोग खुद सोचने की जगह अंधानुकरण ही करते हैं, परिणामों का अवलोकन किये बगैर। अल्पकालीन और दीर्घकालीन परिणामों के अंतर पर गौर करने की जगह किसी और अक्ल के अंधे का मुंह ताकना आसान लगता है, आमलोगों को…

अक्सर पूंजीपति वर्ग, अपनी कुत्सित आकांक्षाओं की पूर्ति के लिए, उन्हें भरमाये रहता है। हम जानते हैं कि, सारा प्रचार तंत्र पूंजीपतियों के अधीन है, जिनमें से अधिकांश अपने तुच्छ स्वार्थ की पूर्ति के लिए या अज्ञानतावश किसी भी हद तक गिर सकते हैं।

तो आइये, हम मूल विषय पर लौटते हैं।

आखिर लोगों की जरुरत क्या है और उन्हें पसंद क्या है?

संघर्ष ही जरुरत है और पलायन ही पसंद है।

उदहारण के लिए आपने इल्ली और तितली वाली कहानी सुनी होगी, जिसमें इल्ली के अकथनीय संघर्ष को देखकर, एक छात्र को दया आ गयी और उसने झिल्ली को फाड़कर इल्ली की मदद कर दी और बाहर निकलते ही इल्ली की मृत्यु हो गयी। प्रोफेसर जो छात्रों को केवल देखते रहने और छूने से मना करके बाहर गए हुए थे, वापस लौटने पर लज्जित छात्र को समझाए कि, तूने इस पर दया नहीं की बल्कि, इसकी हत्या कर दी। तुमने इसका संघर्ष छीन लिया जो इसके फेफड़ों, डैनों और अन्य अंगों के विकास के लिए, आवश्यक था। उसी संघर्ष से इसे बाहरी दुनिया में जीने के लायक “शक्ति” मिलने वाली थी।

“संघर्ष से ही शक्ति मिलती है”, चाहे वह रोगों से लड़ने की शक्ति ही क्यों हो।
पसंद या जरुरत

ठीक इसी प्रकार, जब किसी को बुखार या कोई अन्य तीव्र रोग (acute diseases) होते हैं, जो अक्सर अल्पकालिक होते हैं, तो हमें संघर्ष के लक्षण दिखाई देते हैं। आम तौर पर, बिना दवा के ही, कुछ परहेजों से ही ये लक्षण कुछ घंटों या दिनों में स्वयं समाप्त हो जाते हैं और रोग प्रतिरोधक शक्ति का विकास हो जाता है, जो आने वाले कई जीर्ण रोगों (chronic diseases) से बचाता है।

लेकिन होता क्या है?

लोग रोगों को दबाने वाली व्यवस्था (palliative management) करते हैं जो तत्काल तो बहुत ही पसंद आता है, लेकिन बाद में बहुत ही नापसंद परिणाम आते हैं।

रोगों को दबाते दबाते एक सीमा के बाद जब और दबाना संभव नहीं होता तो “रोगों को बाहर निकलने वाली चिकित्सा” (curative treatment) की ओर लौटना ही पड़ता है।

तबतक बहुत ही देर हो चुकी होती है और एक एक करके दबे हुए रोगों को बाहर निकालने में समय लगना स्वाभाविक ही है।

लेकिन होता यह है कि, एक तो रोगी का धैर्य समाप्त हो चुका होता है और उसका तन-मन-धन तीनों कमजोर पड़ चुका होता है।

ऊपर से जिस संघर्ष से उसे भागने की आदत पड़ चुकी होती है, उसी से उसे लगातार गुजरना पड़ता है।

यह स्थिति चिकित्सक के लिए बहुत ही चुनौतीपूर्ण होती है। एक तो सत्य को समझना मुश्किल होता है, ऊपर से समझाना तो और भी मुश्किल।

रोगी की स्थिति भी ऐसी होती है कि, वह “अनुचित अपेक्षा” रखता है, जो संसार के सभी दुखों का एकमात्र कारण है।

निष्कर्ष यह कि, जो चिकित्सा लोगों को पसंद है, वो रोगों को दबाने वाली व्यवस्था अर्थात palliative management है और जो लोगों की जरुरत है, वो रोगों को बाहर निकालने वाली चिकत्सा अर्थात curative treatment है।

बेहतर यह है कि, समय रहते जरुरत को पहचान लिया जाय तो यही पसंद में बदल जायेगी। ध्यान रहे, “सही मार्ग वह है, जिस पर लौट कर आना ही पड़ता है”।