होमियोपैथी क्या है? क्यों होमियोपैथी?

अगर एक पंक्ति में कहा जाए तो होमियोपैथी “आदर्श उपचार” (Model Cure) की एकमात्र पद्धति है। कैसे?

आदर्श उपचार क्या है?

वह उपचार जो रोगी को स्वास्थ्य की प्रकृतिक अवस्था में पुनः स्थापित कर दे। अर्थात वह अवस्था जिसमें रोगी को किसी भी दवा की कोई भी जरुरत नहीं रहे। यहाँ तक कि उसे रोग का स्मरण भी नहीं रहे। इसे “state of freedom” कह सकते हैं। अर्थात पूर्ण रोग मुक्ति। 

आप जो उपचार ले रहे हैं, वह आदर्श उपचार है या नहीं, कैसे जानेंगे? उपचार के दौरान क्या होना चाहिए? इसे समझने के लिए हमें यह समझना पड़ेगा। 

डॉक्टर हेरिंग ने आदर्श उपचार के तीन नियम बताएं हैं:

पहला:

“रोग ऊपर से नीचे की ओर खिसकना चाहिए”।

(Shifting of the disease should be upward to downward)

दूसरा:

“रोग अंदर से बाहर की ओर खिसकना चाहिए”। 

(Shifting of the disease should be inward to outward)

तीसरा:

“रोग जिस क्रम में प्रकट हुए हैं, उसके विपरीत क्रम में खिसकने चाहिए”।

(Shifting of the disease should be in the reverse direction of the chronological order of appearance)

पहला नियम:

“रोग ऊपर से नीचे की ओर खिसकना चाहिए”

इसे एक उदाहरण लेकर समझते हैं। 

मान लिया जाए कि किसी व्यक्ति को हाथ या पैर में गोली लग गई है। इस स्थिति में भी मृत्यु की कुछ तो संभावना हो सकती है,लेकिन नहीं के बराबर। अब मान लिया जाए कि किसी व्यक्ति को उसके पेट में गोली लग गई है। इस स्थिति में मरने की संभावना और बढ़ जाएगी। अब मान लिया जाए कि किसी व्यक्ति को छाती में या सीने में गोली लग गई। इस स्थिति में  मरने की संभावना और ज्यादा हो जाएगी। अब अगर मान लिया जाए कि किसी व्यक्ति को उसके सिर में गोली लग गई। इस स्थिति  में मरने की संभावना सबसे ज्यादा होगी। कहने का तात्पर्य यह है कि मानव शरीर में सबसे ज्यादा कीमती अंग सबसे ऊपर है, उसके बाद क्रमशः कम कीमती अंग नीचे और हैं। अब अगर रोगों को दबाने वाली चिकित्सा (palliative treatment) की जाएगी तो रोग नीचे से ऊपर की ओर जाएगी, अर्थात कम कीमती अंगों से खिसक कर ज्यादा कीमती अंगों की तरफ जाएगी।

 उदहारण के लिए, किसी के घुटने में दर्द (rheumatic knee) था और उसने एलोपैथिक दवा का सेवन कर लिया। इससे उसके घुटनों का दर्द तो कुछ समय के लिए ठीक हो गया, लेकिन कुछ समय के बाद उसे सीने में दर्द (rheumatic heart) हो गया। इस नयी समस्या में जब उसे पिछली चिकित्सा पद्धति से कोई लाभ नहीं हुआ, तो वह होमियोपैथी इलाज में आया जो कि एक “curarive treatment” अर्थात रोग का जड़ से बाहर निकालने वाली पद्धति है। जब उसे सही तरीके से चुनी गयी होम्योपैथिक दवा दी गयी तो उसका सीने का दर्द जो rheumatic heart की वजह से था, ठीक हो गया, लेकिन कुछ दिनों के बाद, उसे फिर से घुटनों में दर्द होने लगा। यह बहुत ही अच्छा लक्षण था क्योंकि उसका रोग “आदर्श उपचार” की ओर जा रहा थ। अगर रोग ऊपर से नीचे के खिसक रहा हो तो इंतजार करना चाहिए, वह बाहर जाने ही वाला है। लेकिन अज्ञानता वश वह पुराने चिकित्सक के पास चला गया, क्योंकि इसे वह दूसरा रोग समझ रहा था, जिसमे उसे पुराने चिकिसक से लाभ हुआ था। एक बार फिर “पैलिएटिव ट्रीटमेंट” की वजह से, उसका रोग वापस ऊपर की ओर  सीने में चला गया। अब फिर वह वापस होम्योपैथिक चिकित्सा में आता है और जब चिकित्सक को सारी बात बताता है, तो उसे लगता है कि एक बहुत ही अच्छा मौका गँवा दिया गया। एक बार फिर उसे इस प्रक्रिया से गुजरना ही पड़ेगा और शायद इस बार पहले से ज्यादा समय लगे। 

तो इस प्रकार हम देखते हैं कि  आदर्श स्थिति यह है कि, “रोग ऊपर से नीचे की ओर ही खिसकना चाहिए”, जो कि  केवल होमियोपैथी से ही संभव है। 

दूसरा नियम:

“रोग अंदर से बाहर की ओर खिसकना चाहिए”

मान लिया जाय कि किसी को कोई “स्किन-डिजीज” हो गया, जिसका उसने palliative treatment अर्थात एलोपैथिक इलाज करवाया। उसका रोग दब गया और उसने समझा कि रोग ठीक हो गया। कुछ दिनों, महीनों या सालों के बाद, उसे सांस की तकलीफ (respiratory complaints) होने लगी। इस बार उसे पुरानी चिकित्सा पद्धति से स्थायी लाभ नहीं मिला और वह होमियोपैथी की शरण में आया। यहाँ उसकी आंतरिक समस्या ठीक हो गयी, लेकिन रोग पुनः सतह पर आ गया। अर्थात उसकी पुरानी स्किन डिजीज वापस आ गयी।

इसे कहते हैं रोग का अंदर से बाहर की ओर खिसकना। यह बहुत ही अच्छी स्थिति है और थोड़े इंतजार के बाद यह भी नहीं रहेगा। लेकिन लोग समझते हैं कि यह दूसरी बीमारी है, जो पहले हुई थी। या कुछ लोग घबरा जाते हैं कि दवा रिएक्शन कर गया। इस स्थिति में अगर बहरी दवा लगाने या रोग को दबाने वाली चिकित्सा की जाएगी तो रोग पुनः अंदर चला जायेगा और पहले से भी ज्यादा जटिल हो जायेगा। इसी तरह बुखार, सर्दी, पेट ख़राब होना जैसी छोटी मोटी बीमारियां, जो रोग को अंदर से बाहर करती हैं, को अगर दबा दिया जाए तो ये बीमारियां अंदर के ज्यादा कीमती अंगों (more vital organs) को प्रभावित करती हैं और ज्यादा जटिल रोगों का कारण बनती हैं। बाद में जब इन जटिल रोगों की होम्योपैथिक चिकित्सा की जाती है, तो दबे हुए जिन रोगों की वजह से ये जटिल रोग हुए थे, उनका बाहर आना स्वाभाविक ही है, जिसे समझने की जरुरत है। 

तीसरा नियम:

“रोग जिस क्रम में प्रकट हुए हैं, उसके विपरीत क्रम में खिसकने चाहिए”

जिस तरह आप सूटकेस में तह लगाकर कपड़े रखते हैं, तो जब एक एक कर निकालेंगे तो सबसे बाद में जो कपड़ा आपने रखा है, उसे सबसे पहले निकाला जायेगा। उससे पहले जो रखा गया था वो उसके बाद और जो सबसे पहले रखा गया था वो सबसे बाद में निकल जायेगा। इसी तरह जन्म से ही या उससे पहले से ही रोगों को दबाने वाली एलोपैथिक चिकित्सा (palliative treatment) करवाने के कारण शरीर में तह दर तह रोग दबे होते हैं। अब जब रोगों को बाहर निकलने वाली होम्योपैथिक चिकित्सा (curative treatment) की जाती है तो रोग तह दर तह बाहर निकलने लगते हैं। घबराइये नहीं, सभी रोग एक साथ ही बाहर नहीं निकल जाते,बल्कि एक रोग के पूर्ण रूपेण बाहर निकलने के कुछ या बहुत दिनों के बाद ही दूसरा रोग बाहर निकलता है,जो उससे पहले दब चुका था।

कहने का तात्पर्य यह है कि बाद वाले रोग के निकल जाने के बाद, उससे पहले वाला रोग बाहर निकलता है और उसके बाद उससे भी पहले वाला। सबसे अंत में वो रोग बाहर आता है,जो सबसे पहले दब चुका था। 

जनकारी के अभाव में रोगी को लग सकता है कि फलाना रोग तो बहुत पहले ही ठीक हो गया था,होम्योपैथिक दवा खाने से फिर हो गया! दरअसल वो रोग ठीक नहीं हो चुका था, बल्कि अंदर दबा हुआ था,जो बाद में होने वाले ज्यादा जटिल रोगों का कारण बन रहा था। 

निष्कर्ष:

स्वास्थ्य की प्राकृतिक अवस्था को पुनः स्थापित करने के लिए, दबे हुए रोगों का बाहर निकलना जरुरी है और इसी काम को प्रकृति के नियमों के अनुरूप करने वाली चिकित्सा पद्धति है, होमियोपैथी। अब आप समझ चुके हैं कि होमियोपैथी क्या है और इस इलाज के दरम्यान क्या क्या हो सकता है। सन्क्षेप में कहें तो होमियोपैथी नए और पुराने सभी दबे हुए रोगों को ज्यादा कीमती अंगों से काम कीमती अंगों से होते हुए बाहर निकाल कर स्वास्थ्य की प्राकृतिक अवस्था को पुनः स्थापित करने वाली चिकित्सा पद्धति है, जो प्रकृति के नियमों पर आधारित है।

अस्वीकरण: यहाँ दी गयी जानकारी का उद्देश्य केवल शिक्षा प्रदान करना है, न कि चिकित्सा करना। हमारा उद्देश्य किसी भी चिकित्सा पद्धति की आलोचना करना नहीं है, क्योंकि इस संसार में कोई भी चीज सही या गलत, “स्थान, काल और पात्र” के अनुरूप सही या गलत इस्तेमाल पर निर्भर करता है। 

होमियोपैथी चिकित्सा से पहले यह समझना जरूरी है।

अक्सर लोग पूछते हैं कि होमियोपैथी में फलाना रोग की कौन सी दवा है? या फिर यह पूछते हैं कि फलाना रोग का इलाज होमियोपैथी में है या नहीं?

यह समझ लेना चाहिए कि अक्सर जिसे रोग कहा जाता है, वह केवल एक लक्षण या किसी एक अंग से संबंधित लक्षण होते हैं, जबकि रोग का कारण रोगी की जीवनी शक्ति में अव्यवस्था होती है।

होम्योपैथी में किसी भी रोग की कोई भी दवा फिक्स्ड नहीं है।

होम्योपैथी में रोग की दवा खोजने वाले हमेशा असफल रहते हैं। जो रोगी की दवा खोजते हैं, वही सफल होते हैं।

रोग का इलाज करना रोग को दबाना है और आज अधिकांश होमियोपैथ भी यही कर रहे हैं।

इसीलिए एक ही रोग से ग्रसित अलग अलग रोगियों की दवा अलग अलग हो सकती है तथा एक ही दवा अलग अलग रोगों में दी जा सकती है।

अर्थात रोग नहीं रोगी की चिकित्सा की जाती है।

यह निर्भर करता है रोगी के सम्पूर्ण लक्षणों, इतिहास, शारीरिक एवं मानसिक संरचना, सामाजिक एवं आर्थिक स्थिति, घरेलू वातावरण, इत्यादि के गहन अध्ययन एवं विश्लेषण पर।

होमियोपैथी में किसी एक रोग की चिकित्सा नहीं की जाती, बल्कि रोगी की सम्पूर्ण चिकित्सा की जाती है।

अर्थात, हर रोग की चिकित्सा है होमियोपैथी में।

अगर रोगी ने होमियोपैथी चिकित्सा लेने में बहुत ही ज्यादा देर कर दी है और उसकी जीवनी शक्ति बहुत ही ज्यादा कमजोर हो चुकी है, तब रोगों को बाहर निकालना संभव नहीं होता।

यह चिकित्सा रोगी के सारे दबे हुए रोगों को बाहर निकालती है, बारी बारी से…

अतः होमियोपैथी से स्थायी समाधान की जगह अस्थायी रोकथाम की अपेक्षा अनुचित है, जो निराशा का कारण ही बनेगी।

इसीलिए होमियोपैथी चिकित्सा प्रारंभ करने के बाद कोई भी अन्य दवा न खानी चाहिए न लगानी चाहिए।

चाहे वो कोई भी अन्य समस्या क्यों न हो, जबतक कि आपका चिकित्सक स्वयं यह सलाह नहीं दे।

अन्यथा रोग जटिल हो जाता है।

कोई भी रोग जैसे कि बुखार, सर्दी, चर्मरोग इत्यादि अंदर से बाहर निकलने पर खुश होना चाहिए और उसे वापस दबाने वाली चिकित्सा नहीं लेनी चाहिए।

हर मौका एक समस्या है और हर समस्या एक मौका!

जो दिखता है वह होता नहीं और जो होता है वह दिखता नहीं।

अक्सर जो होता है मौका, उसे लोग समझ लेते हैं समस्या। क्योंकि मौका हमेशा पहले भेष बदलकर ही आता है। अर्थात समस्या के रूप में ही वह नजर आता है।

आइए वर्तमान परिस्थिति में हम इस बात को विस्तार से समझने का प्रयास करें।

जैसे अभी हर आदमी एक ही बात बार-बार दोहरा रहा है कोरोना, कोरोना, कोरोना।

पहले तो हम यहां फैसला कर ले कोरोना हमारा मित्र है या शत्रु है?

जहां तक मेरा विचार है कोरोना शत्रु भी है या हो सकता है। अथवा मित्र भी है या हो सकता है। यह निर्भर करेगा होस्ट पर, अर्थात जिसके शरीर में संक्रमण हुआ है।

बिना गहराई में गये भी अगर कॉमन सेंस का इस्तेमाल करें तो, किसी भी महामारी में या किसी भी संक्रमण से सभी व्यक्ति पर एक जैसा असर क्यों नहीं पड़ता?

सीधा सा जवाब मिलेगा, इम्युनिटी! अर्थात, रोग-प्रतिरोधक क्षमता या शक्ति। और थोडी गहराई से विचार करें तो जीवनी शक्ति जिसे वाइटल फ़ोर्स या वाइटल प्रिंसिपल भी कहा गया है।

तो अब प्रश्न उठता है कि, यह रोग-प्रतिरोधकता कैसे बढ़ेगी या सन्तुलित होगी? आत्मनिर्भर बनने से या पराश्रित बनने से?

आत्मनिर्भर या पराश्रित? आप क्या बनना चाहेंगे?

बाहर बाहर कितनी भी व्यवस्था कर लें, संक्रमण को रोकना लगभग असंभव होता है।
जरूरत है अंदर से सबल होने की।

बुखार में जबरदस्ती तापमान को कम करना, टीकाकरण के बाद पेरासिटामोल खिलाना, बचपन से ही हमेशा चप्पल-जूते और कपड़ों में बच्चों को सजा-धजा कर रखना और प्रकृति के संपर्क में नहीं आने देना तथा जब भी शरीर कोई रोग बाहर निकाल रहा हो उसे आधुनिक चिकित्सा के नाम पर दबा देना, इत्यादि रोग-प्रतिरोधकता (इम्युनिटी) को कम कर देते हैं।

किसी का संघर्ष छीनना, उसे शक्ति से वंचित कर देना है।

दरअसल सर्दी-खांसी, बुखार जैसे मौसमी उपसर्ग शरीर की सफाई करने के साथ-साथ इम्यूनिटी ही नहीं वाइटैलिटी को भी “बूस्ट’ करते हैं और वायरस, बैक्टीरिया इत्यादि के संक्रमण इस प्रक्रिया में सहायता करते हैं, अतः जिसे समस्या समझा जाता है, वही मौका होता है!

याद रखिये, महामारियों में सभी लोग नहीं मर जाते, केवल वही मरते हैं, जो अंदर से कमजोर होते हैं।

संघर्ष से ही शक्ति मिलती है, पलायन से तो दुर्बलता ही प्राप्त होगी!

इसीलिए हमारी चिकित्सापद्धति ऐसी होनी चाहिए, जिसमें अनावश्यक बाहरी मदद या हस्तक्षेप नहीं हो। व्यक्ति को आत्मनिर्भर बनाया जाय, न कि पराश्रित।

होमियोपैथी में यही किया जाता है। रोगी को स्वास्थ्य की सामान्य अवस्था में वापस लाया जाता है, जहां उसे किसी भी बाहरी मदद की बार-बार आवश्यकता ही नहीं पड़ती।

Dr. Herring’s 3 Laws of Model Cure. डॉ हेरिंग के आदर्श उपचार के 3 नियम

डॉ हेरिंग ने आदर्श उपचार के 3 नियम बताए हैं…

Dr. Herring has given 3 rules of model cure…

1. रोग ऊपर से नीचे की ओर ही खिसकना चाहिये।
(ज्यादा महत्त्वपूर्ण अंग से कम महत्त्वपूर्ण अंग की ओर)
Shifting of the disease must be upwards to downwards.
(from more vital organ to less vital organ)
2. रोग अंदर से बाहर की ओर ही खिसकना चाहिये।
(ज्यादा महत्त्वपूर्ण अंग से कम महत्त्वपूर्ण अंग की ओर)
Shifting of the disease must be inwards to outwards.
(from more vital organ to less vital organ)
3. रोग जिस क्रम में प्रकट हुए हैं, उसके विपरीत क्रम में ही खिसकना चाहिये।
(नये पहले, पुराने बाद में, और भी पुराने और बाद में)
Shifting of the disease must be in the reverse direction of the chronological order of appearance.
(Newer earlier, older later)
निष्कर्ष यह कि , “रोग ज्यादा महत्त्वपूर्ण अंग से कम महत्त्वपूर्ण अंग की ओर ही खिसकना चाहिए”…
As a conclusion, “shifting of the disease must happen, from the more vital organ to the less vital organ and so on…
अब आप जाँच सकते हैं कि, आपका मामला, आदर्श  उपचार की ओर जा रहा है, या नहीं।

Now you can check, your case is tending to model cure, or not.

Nature’s Law of Cure! Is It Important for You to Know This in the 21st Century?

What is nature’s law of cure? Nature’s law of cure is, “a similar and stronger disease eliminates a similar and weaker disease”. “Similia Similibus Curantur”, which means similar cures similar or like cures like. so, let’s discuss what is the homoeopathic law of nature?

Nature's Law of Cure

How Nature’s Law of Cure was Discovered?

Before coming directly to the point, let’s take a brief tour of the history.

When Master Hahnemann left his Allopathic practice, after being completely dissatisfied by it, he began translating medical scriptures, for his butter and bread.

In 1790, when Hahnemann was engaged in translating Cullen’s Materia Medica from English to German, he became dissatisfied by the remark of the author that, cinchona bark cures malaria due to its bitter taste.

He thought that several other substances also have a bitter taste and every bitter thing can’t have the same effect. His logical and scientific mind couldn’t accept it.

For the purpose of verification, Hahnemann himself ingested 4 drams of cinchona juice twice daily for few a days.

Amazingly, he was attacked by symptoms very similar to ague or malarial fever.

He conducted similar experiments on himself and other healthy individuals with other medicines.

In conclusion, he found that a medicine can cure a disease, because it can produce a similar disease, in healthy individuals.

By this discovery, the law of similia was established.
“Similia Similibus Curantur”…

Thus nature’s law of cure is, “Similia Similibus Curantur”, which means “similar cures similar” or “like cures like” became discovered.

The whole of Homoeopathy derives from this law of nature.

Later he found that the medicine should be slightly stronger than the disease. Hence the methods of potentisation or dynamization were invented.

So nature’s law of cure is, “a similar and stronger disease eliminates a similar and weaker disease”.

All of the 7 Cardinal Principles of Homoeopathy are based upon this law of natural cure.
Nature never changes its laws.

They are universal truths. As laws of motion, the law of gravitation can’t be changed over time, so nature’s law of cure can’t be changed and will remain effective all the time.

Law of Nature

Without following the laws of nature, no one can achieve true success.
Without following nature’s law of cure, no one can achieve a true cure…

Homeopathy: What? Why? How? When?

What is Homeopathy? Why Homeopathy? How Homeopathy? When Homeopathy?

Homoeopathy! Popularly written as Homeopathy has vast scopes of learning, discussion, research and confusion also. The fact is that most of the practitioners of Homeopathy don’t understand it themselves and hence propagate myths instead of facts towards the masses people.

Here we are going to discuss in brief what, why, how and when about Homeopathy. A detailed post upon each and every topic will be published separately.

What is Homeopathy?
Based upon Nature’s Law of Cure, Homeopathy is a way of treatment to achieve Ideal Cure, in which shifting of the diseases occurs from the more vital organ(s) to less vital organ(s) according to 3 laws of model cure.

Why Homeopathy?
To restore the sick to health, to cure, as it is termed.

Restore is a term indicating that something has been altered, something has deviated from its normal state, which needs to be moved in the reverse direction.

Sick is a term indicating the patient as a whole, the person who needs the treatment, not mare parts of his body affected.

Health is a term indicating the normal state of well-being, physically, mentally and spiritually too.

Read more…

How Homeopathy?
By following all of the 7 Cardinal Principles of Homeopathy, which is merely followed by very few physicians.

When Homeopathy?
Whenever a person becomes sick, except where the vitality is too weak to react. Even many so-called surgical cases can be treated with medicine, with or without surgery.

क्या होमियोपैथी और एलोपैथी इलाज एक साथ चल सकता है?

कुछ लोग कहते हैं कि, होम्योपैथिक दवाएं अन्य किसी भी तरह की दवा के साथ दी जा सकती हैं! मैं इससे बिलकुल सहमत नहीं हूँ।

 

पहले हमें समझ लेना चाहिये कि, इलाज की 2 पद्धतियाँ हैं, Curative Treatment और Palliative Management. अर्थात् रोग को जड़ से बाहर कर देने वाली पद्धति और रोग को दबाने वाली पद्धति।

 
आदर्श उपचार वह है, जो रोग को जड़ से बाहर कर दे और स्थायी आरोग्य प्रदान करे, न कि रोग को दबा दे। क्योंकि कोई भी रोग दबने पर ज्यादा महत्त्वपूर्ण अंग में चला जायेगा और ज्यादा गंभीर रोग का कारण बनेगा। तत्काल तो रोगी को आराम महसूस होगा लेकिन बाद में कई गुना ज्यादा कष्ट भोगना पड़ेगा।
 
अब देखिये कि होम्योपैथिक इलाज का मतलब ही है आदर्श उपचार, अर्थात् Curative Treatment. यह पद्धति Nature’s Law of Cure, उपचार के प्राकृतिक नियम पर आधारित है। इस इलाज से रोग ऊपर से नीचे, अंदर से बाहर और नए से पुराने की और खिसकता है। यानि कि प्राकृतिक रूप से रोग, जड़ समेत बाहर निकलता है। जबकि Palliative Treatment में बिलकुल इसका उल्टा होता है। एलोपैथी में रोग को दबाने वाली चिकित्सा ही की जाती है और रोग बिलकुल गलत दिशा में खिसकता है। यानि कि “shifting of the disease, happens in wrong direction”.
 
अब आप ही बताइये, 2 एक दूसरे के विपरीत पद्धतियों का प्रयोग, 1 ही शरीर में, 1 ही साथ, कैसे उचित हो सकता है? जबकि दोनों की क्रिया एक-दूसरे की विपरीत दिशा में होती है।
 
कुछ विरल परिस्थितियों में मास्टर हैनिमैन ने, Palliative Management की अनुमति दी है, जिसका तात्पर्य तथाकथित मॉडर्न मेडिसन की स्थूल दवाओं से कदापि नहीं है। वास्तव में होम्योपैथीक सूक्ष्म दवाओं से antidote करना भी Palliative Management ही है, लेकिन इससे स्थूल दवाओं की तुलना में कम दुष्प्रभाव होते हैं और इनका प्रभाव लंबे समय तक रहता है।
 
प्रायोगिक तौर पर देखा गया है कि, जिन रोगियों की वर्तमान रोगवस्था, होम्योपैथिक उपचार से आरोग्य की ओर अग्रसर थी और कोई पुराना दबा हुआ रोग बाहर निकलने लगा (हो सकता है, उसी की वजह से वर्तमान रोग हुआ था), रोगी ने उसे अन्य रोग समझ कर अन्य चिकित्सक से फिर एलोपैथिक दवा ले ली।
 
उसके कुछ दिनों बाद फिर लौट कर होम्योपैथीक चिकित्सक के पास आया, क्योंकि उसका रोग वापस आ गया था। दुबारा होम्योपैथीक इलाज भी उतनी जल्दी काम नहीं करता, क्योंकि अब रोग और भी ज्यादा जटिल (complicated) हो गया था। इस बार समय और प्रयास और भी ज्यादा लगेगा और आरोग्य लाभ होने की सम्भावना भी क्षीण हो जायेगी।
 
इसीलिये मेरी सलाह यही है कि, होम्योपैथिक इलाज करवाने से पहले इसे समझें
 
अगर आपने अपने शरीर को पूर्णतः रोगमुक्त करने का निर्णय लिया है, यानि शरीर में दबे हुए सभी रोगों को बाहर निकालने का निर्णय लिया है, इतना ही नहीं सूक्ष्म-शरीर के स्तर पर भी विकार रहित करने का निर्णय लिया है, तभी एक अच्छे होम्योपैथीक फिजिशियन से संपर्क करें और एक बार होम्योपैथीक इलाज शुरू करने के बाद अन्य कोई भी दवा नहीं लें। यहाँ तक कि बाहरी प्रयोग वाली दवा या घरेलु इलाज भी। अन्यथा रोग को बाहर निकालने की प्रक्रिया में व्यवधान पड़ेगा, जीवनी शक्ति और भी असंतुलित हो जायेगी तथा रोग और भी जटिल हो जायेगा।
 
हाँ, कुछ विशेष परिस्थितियों में आपको एलोपैथिक दवाओं को एकबारगी बंद करने की जगह धीरे धीरे छोड़ने की सलाह दी जा सकती है, लेकिन अंततः आपको आत्मनिर्भर ही बनना है, पराश्रित नहीं। 
 
अगर आप धीरज और विश्वास के साथ होमियोपैथी में टिके रहेंगे तो एक एक करके आपके अंदर दबी हुई बीमारियां, परत दर परत बाहर निकल जाएंगी और आने वाली भयंकर बीमारियों से बचाव भी होगा।

व्यापार या उपचार? पसंद या जरुरत?

आप किसे चुनेंगे? पसंद या जरुरत? व्यापार या उपचार?

पसंद है लोगों की जो, वो करना व्यापार है। जरुरत है लोगों की जो, वो करना उपचार है।।

पसंद है लोगों की जो, वो उनकी जरुरत नहीं। जरुरत है लोगों की जो, वो उनकी पसंद नहीं।

क्यों? क्योंकि अक्सर उन्हें पता ही नहीं होता कि, उनकी जरुरत क्या है। ज्यादातर लोग खुद सोचने की जगह अंधानुकरण ही करते हैं, परिणामों का अवलोकन किये बगैर। अल्पकालीन और दीर्घकालीन परिणामों के अंतर पर गौर करने की जगह किसी और अक्ल के अंधे का मुंह ताकना आसान लगता है, आमलोगों को…

अक्सर पूंजीपति वर्ग, अपनी कुत्सित आकांक्षाओं की पूर्ति के लिए, उन्हें भरमाये रहता है। हम जानते हैं कि, सारा प्रचार तंत्र पूंजीपतियों के अधीन है, जिनमें से अधिकांश अपने तुच्छ स्वार्थ की पूर्ति के लिए या अज्ञानतावश किसी भी हद तक गिर सकते हैं।

तो आइये, हम मूल विषय पर लौटते हैं।

आखिर लोगों की जरुरत क्या है और उन्हें पसंद क्या है?

संघर्ष ही जरुरत है और पलायन ही पसंद है।

उदहारण के लिए आपने इल्ली और तितली वाली कहानी सुनी होगी, जिसमें इल्ली के अकथनीय संघर्ष को देखकर, एक छात्र को दया आ गयी और उसने झिल्ली को फाड़कर इल्ली की मदद कर दी और बाहर निकलते ही इल्ली की मृत्यु हो गयी। प्रोफेसर जो छात्रों को केवल देखते रहने और छूने से मना करके बाहर गए हुए थे, वापस लौटने पर लज्जित छात्र को समझाए कि, तूने इस पर दया नहीं की बल्कि, इसकी हत्या कर दी। तुमने इसका संघर्ष छीन लिया जो इसके फेफड़ों, डैनों और अन्य अंगों के विकास के लिए, आवश्यक था। उसी संघर्ष से इसे बाहरी दुनिया में जीने के लायक “शक्ति” मिलने वाली थी।

“संघर्ष से ही शक्ति मिलती है”, चाहे वह रोगों से लड़ने की शक्ति ही क्यों हो।
पसंद या जरुरत

ठीक इसी प्रकार, जब किसी को बुखार या कोई अन्य तीव्र रोग (acute diseases) होते हैं, जो अक्सर अल्पकालिक होते हैं, तो हमें संघर्ष के लक्षण दिखाई देते हैं। आम तौर पर, बिना दवा के ही, कुछ परहेजों से ही ये लक्षण कुछ घंटों या दिनों में स्वयं समाप्त हो जाते हैं और रोग प्रतिरोधक शक्ति का विकास हो जाता है, जो आने वाले कई जीर्ण रोगों (chronic diseases) से बचाता है।

लेकिन होता क्या है?

लोग रोगों को दबाने वाली व्यवस्था (palliative management) करते हैं जो तत्काल तो बहुत ही पसंद आता है, लेकिन बाद में बहुत ही नापसंद परिणाम आते हैं।

रोगों को दबाते दबाते एक सीमा के बाद जब और दबाना संभव नहीं होता तो “रोगों को बाहर निकलने वाली चिकित्सा” (curative treatment) की ओर लौटना ही पड़ता है।

तबतक बहुत ही देर हो चुकी होती है और एक एक करके दबे हुए रोगों को बाहर निकालने में समय लगना स्वाभाविक ही है।

लेकिन होता यह है कि, एक तो रोगी का धैर्य समाप्त हो चुका होता है और उसका तन-मन-धन तीनों कमजोर पड़ चुका होता है।

ऊपर से जिस संघर्ष से उसे भागने की आदत पड़ चुकी होती है, उसी से उसे लगातार गुजरना पड़ता है।

यह स्थिति चिकित्सक के लिए बहुत ही चुनौतीपूर्ण होती है। एक तो सत्य को समझना मुश्किल होता है, ऊपर से समझाना तो और भी मुश्किल।

रोगी की स्थिति भी ऐसी होती है कि, वह “अनुचित अपेक्षा” रखता है, जो संसार के सभी दुखों का एकमात्र कारण है।

निष्कर्ष यह कि, जो चिकित्सा लोगों को पसंद है, वो रोगों को दबाने वाली व्यवस्था अर्थात palliative management है और जो लोगों की जरुरत है, वो रोगों को बाहर निकालने वाली चिकत्सा अर्थात curative treatment है।

बेहतर यह है कि, समय रहते जरुरत को पहचान लिया जाय तो यही पसंद में बदल जायेगी। ध्यान रहे, “सही मार्ग वह है, जिस पर लौट कर आना ही पड़ता है”।