अगर एक पंक्ति में कहा जाए तो होमियोपैथी “आदर्श उपचार” (Model Cure) की एकमात्र पद्धति है।

आदर्श उपचार क्या है?

वह उपचार जो रोगी को स्वास्थ्य की प्रकृतिक अवस्था में पुनः स्थापित कर दे। अर्थात वह अवस्था जिसमें रोगी को किसी भी दवा की कोई भी जरुरत नहीं रहे। यहाँ तक कि उसे रोग का स्मरण भी नहीं रहे। इसे “state of freedom” कह सकते हैं। अर्थात पूर्ण रोग मुक्ति। 

आप जो उपचार ले रहे हैं, वह आदर्श उपचार है या नहीं, कैसे जानेंगे? उपचार के दौरान क्या होना चाहिए? इसे समझने के लिए हमें यह समझना पड़ेगा। 

डॉक्टर हेरिंग ने आदर्श उपचार के तीन नियम बताएं हैं:

पहला:

“रोग ऊपर से नीचे की ओर खिसकना चाहिए”।

(Shifting of the disease should be upward to downward)

दूसरा:

“रोग अंदर से बाहर की ओर खिसकना चाहिए”। 

(Shifting of the disease should be inward to outward)

तीसरा:

“रोग जिस क्रम में प्रकट हुए हैं, उसके विपरीत क्रम में खिसकने चाहिए”।

(Shifting of the disease should be in the reverse direction of the chronological order of appearance)

पहला नियम:

“रोग ऊपर से नीचे की ओर खिसकना चाहिए”

इसे एक उदाहरण लेकर समझते हैं। 

मान लिया जाए कि किसी व्यक्ति को हाथ या पैर में गोली लग गई है। इस स्थिति में भी मृत्यु की कुछ तो संभावना हो सकती है,लेकिन नहीं के बराबर। अब मान लिया जाए कि किसी व्यक्ति को उसके पेट में गोली लग गई है। इस स्थिति में मरने की संभावना और बढ़ जाएगी। अब मान लिया जाए कि किसी व्यक्ति को छाती में या सीने में गोली लग गई। इस स्थिति में  मरने की संभावना और ज्यादा हो जाएगी। अब अगर मान लिया जाए कि किसी व्यक्ति को उसके सिर में गोली लग गई। इस स्थिति  में मरने की संभावना सबसे ज्यादा होगी। कहने का तात्पर्य यह है कि मानव शरीर में सबसे ज्यादा कीमती अंग सबसे ऊपर है, उसके बाद क्रमशः कम कीमती अंग नीचे और हैं। अब अगर रोगों को दबाने वाली चिकित्सा (palliative treatment) की जाएगी तो रोग नीचे से ऊपर की ओर जाएगी, अर्थात कम कीमती अंगों से खिसक कर ज्यादा कीमती अंगों की तरफ जाएगी।

 उदहारण के लिए, किसी के घुटने में दर्द (rheumatic knee) था और उसने एलोपैथिक दवा का सेवन कर लिया। इससे उसके घुटनों का दर्द तो कुछ समय के लिए ठीक हो गया, लेकिन कुछ समय के बाद उसे सीने में दर्द (rheumatic heart) हो गया। इस नयी समस्या में जब उसे पिछली चिकित्सा पद्धति से कोई लाभ नहीं हुआ, तो वह होमियोपैथी इलाज में आया जो कि एक “curarive treatment” अर्थात रोग का जड़ से बाहर निकालने वाली पद्धति है। जब उसे सही तरीके से चुनी गयी होम्योपैथिक दवा दी गयी तो उसका सीने का दर्द जो rheumatic heart की वजह से था, ठीक हो गया, लेकिन कुछ दिनों के बाद, उसे फिर से घुटनों में दर्द होने लगा। यह बहुत ही अच्छा लक्षण था क्योंकि उसका रोग “आदर्श उपचार” की ओर जा रहा थ। अगर रोग ऊपर से नीचे के खिसक रहा हो तो इंतजार करना चाहिए, वह बाहर जाने ही वाला है। लेकिन अज्ञानता वश वह पुराने चिकित्सक के पास चला गया, क्योंकि इसे वह दूसरा रोग समझ रहा था, जिसमे उसे पुराने चिकिसक से लाभ हुआ था। एक बार फिर “पैलिएटिव ट्रीटमेंट” की वजह से, उसका रोग वापस ऊपर की ओर  सीने में चला गया। अब फिर वह वापस होम्योपैथिक चिकित्सा में आता है और जब चिकित्सक को सारी बात बताता है, तो उसे लगता है कि एक बहुत ही अच्छा मौका गँवा दिया गया। एक बार फिर उसे इस प्रक्रिया से गुजरना ही पड़ेगा और शायद इस बार पहले से ज्यादा समय लगे। 

तो इस प्रकार हम देखते हैं कि  आदर्श स्थिति यह है कि, “रोग ऊपर से नीचे की ओर ही खिसकना चाहिए”, जो कि  केवल होमियोपैथी से ही संभव है। 

दूसरा नियम:

“रोग अंदर से बाहर की ओर खिसकना चाहिए”

मान लिया जाय कि किसी को कोई “स्किन-डिजीज” हो गया, जिसका उसने palliative treatment अर्थात एलोपैथिक इलाज करवाया। उसका रोग दब गया और उसने समझा कि रोग ठीक हो गया। कुछ दिनों, महीनों या सालों के बाद, उसे सांस की तकलीफ (respiratory complaints) होने लगी। इस बार उसे पुरानी चिकित्सा पद्धति से स्थायी लाभ नहीं मिला और वह होमियोपैथी की शरण में आया। यहाँ उसकी आंतरिक समस्या ठीक हो गयी, लेकिन रोग पुनः सतह पर आ गया। अर्थात उसकी पुरानी स्किन डिजीज वापस आ गयी।

इसे कहते हैं रोग का अंदर से बाहर की ओर खिसकना। यह बहुत ही अच्छी स्थिति है और थोड़े इंतजार के बाद यह भी नहीं रहेगा। लेकिन लोग समझते हैं कि यह दूसरी बीमारी है, जो पहले हुई थी। या कुछ लोग घबरा जाते हैं कि दवा रिएक्शन कर गया। इस स्थिति में अगर बहरी दवा लगाने या रोग को दबाने वाली चिकित्सा की जाएगी तो रोग पुनः अंदर चला जायेगा और पहले से भी ज्यादा जटिल हो जायेगा। इसी तरह बुखार, सर्दी, पेट ख़राब होना जैसी छोटी मोटी बीमारियां, जो रोग को अंदर से बाहर करती हैं, को अगर दबा दिया जाए तो ये बीमारियां अंदर के ज्यादा कीमती अंगों (more vital organs) को प्रभावित करती हैं और ज्यादा जटिल रोगों का कारण बनती हैं। बाद में जब इन जटिल रोगों की होम्योपैथिक चिकित्सा की जाती है, तो दबे हुए जिन रोगों की वजह से ये जटिल रोग हुए थे, उनका बाहर आना स्वाभाविक ही है, जिसे समझने की जरुरत है। 

तीसरा नियम:

“रोग जिस क्रम में प्रकट हुए हैं, उसके विपरीत क्रम में खिसकने चाहिए”

जिस तरह आप सूटकेस में तह लगाकर कपड़े रखते हैं, तो जब एक एक कर निकालेंगे तो सबसे बाद में जो कपड़ा आपने रखा है, उसे सबसे पहले निकाला जायेगा। उससे पहले जो रखा गया था वो उसके बाद और जो सबसे पहले रखा गया था वो सबसे बाद में निकल जायेगा। इसी तरह जन्म से ही या उससे पहले से ही रोगों को दबाने वाली एलोपैथिक चिकित्सा (palliative treatment) करवाने के कारण शरीर में तह दर तह रोग दबे होते हैं। अब जब रोगों को बाहर निकलने वाली होम्योपैथिक चिकित्सा (curative treatment) की जाती है तो रोग तह दर तह बाहर निकलने लगते हैं। घबराइये नहीं, सभी रोग एक साथ ही बाहर नहीं निकल जाते,बल्कि एक रोग के पूर्ण रूपेण बाहर निकलने के कुछ या बहुत दिनों के बाद ही दूसरा रोग बाहर निकलता है,जो उससे पहले दब चुका था।

कहने का तात्पर्य यह है कि बाद वाले रोग के निकल जाने के बाद, उससे पहले वाला रोग बाहर निकलता है और उसके बाद उससे भी पहले वाला। सबसे अंत में वो रोग बाहर आता है,जो सबसे पहले दब चुका था। 

जनकारी के अभाव में रोगी को लग सकता है कि फलाना रोग तो बहुत पहले ही ठीक हो गया था,होम्योपैथिक दवा खाने से फिर हो गया! दरअसल वो रोग ठीक नहीं हो चुका था, बल्कि अंदर दबा हुआ था,जो बाद में होने वाले ज्यादा जटिल रोगों का कारण बन रहा था। 

निष्कर्ष:

स्वास्थ्य की प्राकृतिक अवस्था को पुनः स्थापित करने के लिए, दबे हुए रोगों का बाहर निकलना जरुरी है और इसी काम को प्रकृति के नियमों के अनुरूप करने वाली चिकित्सा पद्धति है, होमियोपैथी। अब आप समझ चुके हैं कि होमियोपैथी क्या है और इस इलाज के दरम्यान क्या क्या हो सकता है। सन्क्षेप में कहें तो होमियोपैथी नए और पुराने सभी दबे हुए रोगों को ज्यादा कीमती अंगों से काम कीमती अंगों से होते हुए बाहर निकाल कर स्वास्थ्य की प्राकृतिक अवस्था को पुनः स्थापित करने वाली चिकित्सा पद्धति है, जो प्रकृति के नियमों पर आधारित है।

अस्वीकरण: यहाँ दी गयी जानकारी का उद्देश्य केवल शिक्षा प्रदान करना है, न कि चिकित्सा करना। हमारा उद्देश्य किसी भी चिकित्सा पद्धति की आलोचना करना नहीं है, क्योंकि इस संसार में कोई भी चीज सही या गलत, “स्थान, काल और पात्र” के अनुरूप सही या गलत इस्तेमाल पर निर्भर करता है। 

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